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शहर हमारा बेरोज़गार है साहब ।

शहर हमारा बेरोज़गार है साहब ।।


   पहली बार अपने शहर में अकेला निकाला था कही घूमने,उम्र ज्यादा नही वही 13-14 साल रही होगी। पहली बार थोड़ा आज़ादी और साथ ही डर भी महसूस हुआ जो मम्मी पापा के साथ होने पर नही हुआ करता था , पर अच्छा लगा कई जगहों पर घूमा , और फिर दोपहर को घर वापस आने लगा कि सड़क पार करते समय एक आदमी ने मेरा हाथ पक्कड़ लिया, "उसने कहा इतनी क्या जल्दी है रेड लाइट हो जाने दो, फिर जाना"(उसे देख कर लगता था जैसे जिंदगी में उसने सब्र करना अच्छे से सीखा है)थोड़ी देर के लिए मैं घबरा गया(लड़का हुआ तो क्या हुआ) लेकिन फ़िर उसने रेड लाइट होते ही मुझे दूसरी तरफ छोड़ कर आगे चल दिया ,रात को मैं उस आदमी के बार में सोचता हुआ सो गया ।


अगले दिन सुबह रोज कि तरह घर के पास वाले पार्क में खेलने जाया करता था ,पार्क के गेट को तो लोगों ने कूड़ाघर समझ रखा था, हर कोई वही कूड़ा फेंकता था , पर मैंने देखा की आज कोई वहाँ एक छोटी सी जग़ह में सफाई कर रहा था मैं थोड़ा जल्दी में था तो ध्यान नही दिया और पार्क के अंदर चला गया ।

खेल खेल कर थक जाने के बाद घर वापस आने लगा तो देखा पार्क के गेट के पास एक मोची अपना तामझाम सही से लगा रहा था ध्यान से देखा तो पता चला की वही आदमी था जिसने मुझे सड़क पार करवाया था ।
     घर आ कर नए मोची की दुकान के बारे में मैने माँ का बताया ,वो तो काफी खुश हुई इस पहले जूता या चप्पल टूट जाने पर काफी दूर जाना पड़ता था ।
    खैर शाम तक ऐसे हालात बन चुके थे कि घर में एक चप्पल का सिर फट चूका था , मैंने मन में सोचा लगता है कि उस मोची की बोनी मेरे हाथों ही लिखी है , मैं प्लास्टिक की थैली में चप्पल को रखा और उसकी दुकान पर चल दिया , उसने फटाफट मेरे चप्प्पल के सिर में टांके मार दिया, सिर्फ 2 रूपये में ।


      वैसे मोची नही,ऐसा लगता था किसी ऑफिस में काम करता है । रोज एक नयी गहरे रंग की शर्ट पहनकर आता था रोज 10 बजे आना और शाम को 6 बजे ठीक निकाल जाना , जैसे उसके आगे पीछे कोई हो ही नही और खुद के जीने भर का काम कर रहा था , सभी को "बाबूजी" कहा करता, जब कोई उनकी दुकान में आता ऐसे बात करता जैसे कोई अपना ही उनकी दुकान पर आया हो ।

    पर धीरे धीरे समय बढ़ता गया आज वही 2 रूपये की कीमत बढ़कर 5 से 10,15,20,25 और 30 तक चली गयी है अब वो ऑफिस वाला रूतबा ख़त्म हो चूका है ,सुबह 8 बजे से शाम 8 बजे तक काम करता है वो भी एक गंदे से कुर्ते में , आज भी लोगों को बाबुजी ही कहता है पर सिर उठा कर देखता नही अपना काम करता है ।
ऐसा लगता है जैसे कि सभी तजुर्बा हासिल कर चुके है । अब कम शब्दों में अपनी बात कहने की आदत डाल ली है उसने ,अब कभी जब उनकी दुकान पर जाता हूं तो वही बैठा जाता हूं कुछ देर कुछ बातें होती है तो एक ही बात कहते है कि "बाबूजी हमारा शहर तो अब बेरोज़गार हो गया" !

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