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KUCH MAUSAMI SA !

कुछ मौसमी-सा ।। Hello ,  दोस्तों  ये मौसम भी कमाल है, कभी ध्यान दिया है कि कैसे ये बदलता है ? और, कैसे बदलते है समाज व रिश्ते  ? चलिए समझने की कोशिश करते है । वैसे मौसम कि बातें ज्यादातर मौसम विभाग या फिर प्यार में डूबे लोग के मुंह से ही अच्छा लगता है जिस पर सोचने के लिए शायद उन्होंने कॉपीराइट्स भी लिया होता है । वैसे देखे तो मौसम और समाज में काफी जुड़ाव देखने को मिलता है , किसी समाज का स्वभाव कैसा होगा,ये वहाँ के मौसम से भी पता चल सकता है , ठीक वैसे ही जैसे काफी दिन की गर्मी गुस्साए लोगों को बारिश का मौसम ख़ुशनुमा सा कर देता है , और लोगों के स्वभाव बदल कर रख देती है ।    सिर्फ बारिश को ले तो इसका असर सभी  लोगों पर देखने को मिलता है ,कुछ के लिए बारिश मस्ती के जैसा ,कुछ के लिए पहले प्यार जैसा तो किसी के लिए बहार और कुछ के लिए एक लंबे इन्तजार के जैसा। यही नही और बाकि मौसमो का भी कुछ यही हाल है ।        किसी ने कहा था कि '' सर्दियों सेठो की होती है , तो गर्मियां गरीबो की '' कैसे? समझता हूं रुकिए ! सर्दियां थोड़ी बेरहम सी म...

KALPANA KA SAFAR !

कल्पना का सफ़र  HELLO दोस्तों, इंसान के पास एक अदभुत शक्ति है वो है ''कल्पना'' ,उनकी क्षमता का आधार,जिसके ऊपर उसके सभी सपने और अरमान टिके होते है । और एक ही चीज को कई तरह से देखने का नज़रिया भी कल्पना शक्ति से मिलता है ।   बस का सफ़र भी उसी अलग कल्पना का हिस्सा है , जिसे बस की भीड़ भाड़ में आपने शायद अनदेखा कर दिया हो , या आपके हैडफ़ोन ने आपकी कल्पना की आवाज को आप तक पहुचने ही नही दिया शायद ? ये भी हो सकता है बस में लड़ाई ,ट्रैफिक,गर्मी , सीट न मिलने की वजह से आपकी कल्पना आपके माथे से नीचे आने की कोशिश नही करती , और भी बहुत से कारण हो सकते है ।   आगे चलते है बता कल्पना की हो रही थी, तो बस का सफ़र की तुलना अपनी जिंदगी से अपने कल्पना में कि जा सकती है   और आपको पता चलेगा कि उस सफर में और आपकी जिंदगी में कोई खास फर्क नही है । हर बस स्टॉप से कोई न कोई चढ़ता है और उतरता भी बिलकुल वैसे जैसे किसी का जन्म लेना और मरना , उसके बाद वो टिकेट के रूप में अपना भविष्य खरीदता है ''क्या करे इंसान है !'' जैसे टिकेट में एक जगह तय होती है वैसी ही आपका भविष्य भी तय होता ...

BADALTI HAWAA !

बदलती हवा  दोस्तों हाँ जी राम-राम । कृप्या राम-राम को साम्प्रदायिकता से न देखे यह देश विभिन्ता में एकता का प्रतीक है , जैसे तेज बारिश के बाद निकाला इंद्रधनुष 7 अगल-अलग रंग पर एक कतार में बिलकुल वैसा । तो बात थोड़ी गंभीर है , या कहे की मौसम में कुछ ऐसा है इस महीने जगह-जगह दीवार के पीछे , खिड़की से, छत के मुहाने से व बाल्कनी पर से आज कल कोई छुप कर कोई ताक लगाए बैठा हुआ-सा महसूस होता है ! बड़ी नाज़ुक स्तिथि है पास की दुकानों पर ग्रेनेट जैसे गुब्बरे , A K 47 जैसे पिचकारियाँ , वाटर टैंक , रंग  की गोलियां सस्ते दामों में मौजूद है जो किसी को भी डर सकते है । जी बिल्कुल ज़नाब मौसम ही कुछ ऐसा है , आज कल ''लोग सर उठा कर चलने लगे है '' महीने का आलम ही कुछ ऐसा है सभी भेद-भाव ,अमीरी गरीबी,बच्चा,नवजवान,महिलाओं,बुजुर्गो सभी को सर उठाने का मौका दे रहा है , कारण वही डर है,और आप जानते है कि किस चीज के डर की बात में कर रहा हूँ। चलिये कोई नही इसी बहाने एक समानता का माहौल समाज में देखने को मिलता है और सब से ज्यादा इस समानता का असर मथुरा में देखने को मिलता है जहाँ 15 से 20 दिन तक अलग ...

KHABAR !

ख़बर  HELLO दोस्तों, ''सोशल मीडिया'' का महत्त्व हर दिन के साथ बढ़ता जा रहा है , कारण सिर्फ इनफार्मेशन और नॉलेज नही बल्कि कनेक्टिविटी है , पूरी दुनिया को ''एक समुदाय'' बनने की और यह तकनीक ''वैश्वीकरण'' की देंन है। आप उस नीले रंग वाले F के साइन से परिचित जरूर होंगे और उस आसमानी रंग की चिड़िया से भी, जो तेजी से आम लोगो की खासतौर और टीनेजर्स की लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुकी है । कुछ लोगों से तो ये एक लाइलाज बीमारी की तरह चिपके रहता है, और ये बीमार लोग आसानी से लाइनों में ,रोड पर, रेस्टुरेंट में , मेट्रो ,बस , गाड़ी , घरों और पार्कों आदि में सर झुके मिल सकते है , और ''ध्यान से'' इनके पास  न जाये दुरी बना कर रखे क्यू की सेल्फी नाम का वायरस इन सभी के फ़ोन से निकलता है जो आपको भी अजीब अजीब हरकते करने पर मजबुर कर सकता है फिर चाहे आप कितना भी होश में क्यू न हो ! बोर्ड परीक्षा का दौर बस शुरू होने ही वाला है और मजे की बात ये है कि सोशल साइट से अकाउंट डिलीट करने का सिलसिला भी शुरू हो गया है जिसमे ज्यादातर स्कूली छात्र शामिल ह...

AKHIR CHUNAV KISKA ?

आख़िर चुनाव किसका ? Hello, दोस्तों       एक बड़ी ही रोमांचक मेले के बारे में बताने जा रहा हूँ शायद आप सब उससे परिचित जरूर होंगे। नही,में कुंभ के मेले की बात नही कर रहा हूँ जो हर 12साल बाद मनाया जाता है मैं बात कर रहा हूँ उसकी जो हर 5 साल में एक बार आता है और उसके आखिरी साल मतलब 5वे साल लोग और कुछ टोपी वाले झंडे और गड़िया ले कर आपकी घर के पास वाली रोड या पार्क पर लोकतंत्र की दुहाई देने कीे शुरुवात करते है । हम भी क्या करे बड़े ही आशावादी है ? सिर्फ दुहाई ही दे सकते है कि शायद कभी तो , वो मशीन शायद कोई देव दुत ले कर आये जो सब ठीक कर दें । चलिये आश और निराश की बात छोड़िये और अब एक सवाल की आख़िर में चुनाव किसका? मै किसी सफ़ेद कुरता पहननें वाले को चुनने की बात नही कर रहा हूँ ,बल्कि इस बात से हैरान हूं कि आख़िर में कौन किस का चुनाव करता है ? हम उनका चुनाव करते है कि वो हमारा चुनाव करते है ? अब तक शायद समझ ही गया होंगे की यहाँ बात हो रही शोषण की , की किस तरह चुनाव और चुनावी प्रक्रिया बदलती जा रही है पर लोगों की हालत में सुधार दिखाई नही पड़ रहा है , लोग विश्वास करते है वा...

EK BURI AADAT !

एक बुरी आदत । HELLO,दोस्तों जब मैं  छोटा था, शिक्षा एक रौशनी की तरह थी मेरे लिए शायद आपके लिए भी होगा? ज़रूर होगा, तभी तो बस उसी रौशनी को ढूढ़ने मैंने 4 घेरे को छोड़ बस कुछ ही दूर अपने घर से एक नयी आदत बना ली वैसी ही जैसे क्रिकेट खेलना ,हाथ पकड़ कर चलना, सब को नमस्ते करना,टॉयलेट लगने पर बता देना, कहानी सुनना और कुछ वैसे ही, बस फर्क क्या था उन आदतो में ,ये मैं आज जा कर समझ हूँ। पता नही आप समझे न समझे जो मै आज महसूस कर रहा हूँ शायद उस कॉपी के कागज़ से ऊपर आना  ही वो रौशनी थी जिसे मैंने अपने नंबरों के बीच देखा ही नही, या शायद  परिवार की उम्मीदों में छुप सा गया था। मैंने आज जाना की क्यू 6वी क्लास से 12वी क्लास में प्रोजेक्ट मिलने पर मेरे नम्बर तो ठीक थे पर वो कुछ सीख जाने को अनुभव नही मिला । हो सकता है शायद x का मान निकालने से, नमक के क्रियाशीलता से, राष्टीय आय और समाजवाद  की टिप्पड़ी करने से उसको समझना ज्यादा जरूरी था। मैंने पाया कि कैसे मैंने अपने अर्थों को किताबों की अर्थों के नीचे दबा रखा था । कैसे मैंने अपने सवाल को हल करने के तरीके को किसी और के 5 स्टैप्स के...