आख़िर चुनाव किसका ?
Hello, दोस्तों
एक बड़ी ही रोमांचक मेले के बारे में बताने जा रहा हूँ शायद आप सब उससे परिचित जरूर होंगे। नही,में कुंभ के मेले की बात नही कर रहा हूँ जो हर 12साल बाद मनाया जाता है मैं बात कर रहा हूँ उसकी जो हर 5 साल में एक बार आता है और उसके आखिरी साल मतलब 5वे साल लोग और कुछ टोपी वाले झंडे और गड़िया ले कर आपकी घर के पास वाली रोड या पार्क पर लोकतंत्र की दुहाई देने कीे शुरुवात करते है ।
हम भी क्या करे बड़े ही आशावादी है ? सिर्फ दुहाई ही दे सकते है कि शायद कभी तो , वो मशीन शायद कोई देव दुत ले कर आये जो सब ठीक कर दें ।
चलिये आश और निराश की बात छोड़िये और अब एक सवाल की आख़िर में चुनाव किसका? मै किसी सफ़ेद कुरता पहननें वाले को चुनने की बात नही कर रहा हूँ ,बल्कि इस बात से हैरान हूं कि आख़िर में कौन किस का चुनाव करता है ?
हम उनका चुनाव करते है कि वो हमारा चुनाव करते है ?
अब तक शायद समझ ही गया होंगे की यहाँ बात हो रही शोषण की , की किस तरह चुनाव और चुनावी प्रक्रिया बदलती जा रही है पर लोगों की हालत में सुधार दिखाई नही पड़ रहा है ,
लोग विश्वास करते है वादों और रैलियों की राजनीति पर , वैसे और कुछ कर भी तो नही सकते और जो कुछ कर रहे है उन पर सीबीआई की जाँच होना आम बात है , या वो जेल में ठुसे हुए है और वह बैठ कर लोकतंत्र के गाने गा रहे है ।
आज लोकतंत्र और राष्ट्रवाद को राजनीती अपना कन्धा बन चूका है और मेरे ख्याल से आपके और मेरा विरोध शायद हमे "देशद्रोही" बना दे।
''एक कहानी'' है शायद अपनी सुनी हो
एक राजा था और जैसे की आप सब जानते है कि न्याय करना राजा का ही कम था! एक बार की बात है एक आदमी को किसी ने झूठे आरोप में फसा दिया , उस आदमी ने राजा से बहुत समझने की कोशिश की पर उसका कोई फायदा नही हुआ तो उसने इतना कहाँ की भले ही आप मुझे साज़ दे पर मुझे जान से न मारे और इसे मेरी अंतिम इच्छा समझी जाये।
राजा भी एक राजनीतिक पशु (poltical Animal)ही था उसने अपना राजनीतिक दिमाक लगया और एक अनोखी सजा उसे दी ।
सजा कुछ इस तरह की थी ,की उसमे दो विकल्प दिए या तो सौ प्याज खाएं या सौ कोड़े पर जो भी खाए लगातार खाए चाहे प्याज़ हो या चाहे कोड़े और अगर वो सौ पूरा होने से पहले दोनों में से कोई एक भी सजा बीच में छोड़ता है तो उसे फिर से, मतलब शुरू से सजा दी जायेगी ।
उसने सोच क्यू न सौ प्याज खाया जाए , और फिर आराम से घर जाएं , उसने देर न करते हुए प्याज खाना शुरू किया और 20-30 प्याज खाते ही उसका मुँह जलने लगा और उसने फिर सोचा कोड़े ही खा लेता हूं पर 5-6कोड़े खाते ही वो चिल्लाने लगा और सोच प्याज खाना ही ठीक था और फिर प्याज खाने लगा और फिर से उसका मुह जलने लगे तो सोच कोड़े ही खाता हूँ और फिर ये सिलसिला चलता रहा और उसकी सजा कभी पूरी ही नही हुई ।
ऐसी ही हालत आज की जनता की है ,कभी वो प्याज़ खाती है तो कभी कोड़े ,चाहे किसी की भी सत्ता हो लोगो को राहत मिलने मुमकिन नही । और हालत ये हो गयी है कि समझ नही आता है की आख़िर आज किस का चुनाव हो रहा है ?
ग्रीक में शुरूँ हुई संरचना , एक विचार ''लोकतंत्र'' आज अपने अर्थ बदल रहा है व अपना विस्तार भी कर रहा है परंतु लिंकन का मशहुर वाक्य था लोगो से, लोगो के द्वारा , लोगो के लिए , तो विश्वास कीजिये और लोकतंत्र में जी रहे है तो वोट दीजीये, नागरिकों के कर्तव्यों का पालन कीजिए, संविधान में यक़ीन कीजिये, न्याय प्रक्रिया पर विश्वास कीजिये, और लोकतंत्र की गुड़गान कीजिये ।
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-Az👤
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